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शेर
गुल खिलाए न कहीं फ़ित्ना-ए-दौराँ कुछ और
आज-कल दौर-ए-मय-ओ-जाम से जी डरता है
अख़्तर अंसारी अकबराबादी
शेर
रात दिन गर्दिश में है पर हो नहीं सकता हनूज़
दौर-ए-दामान-ए-फ़लक इस दौर-ए-दामाँ का हरीफ़
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
इश्क़ के दर्द का ख़ुद इश्क़ को एहसास नहीं
खिंच गया बादे से भी दुर्द-ए-तह-ए-जाम बहुत
फ़िराक़ गोरखपुरी
शेर
किसे ख़बर थी कि ये दौर-ए-ख़ुद-ग़रज़ इक दिन
जुनूँ से क़ीमत-ए-दार-ओ-रसन छुपाएगा