aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "dhalne"
सियाह रात नहीं लेती नाम ढलने कायही तो वक़्त है सूरज तिरे निकलने का
शाम ढलने से फ़क़त शाम नहीं ढलती हैउम्र ढल जाती है जल्दी पलट आना मिरे दोस्त
ये हवा सारे चराग़ों को उड़ा ले जाएगीरात ढलने तक यहाँ सब कुछ धुआँ हो जाएगा
साए ढलने चराग़ जलने लगेलोग अपने घरों को चलने लगे
उस ने दिन जल्दी ढलने की ख़्वाहिश कीधरती ने रफ़्तार बढ़ा दी गर्दिश की
सफ़र आवारगी का है 'वलीद' अब सोचना कैसाअँधेरी रात ढलने पर कभी मैं घर भी देखूँगा
बुत-ख़ाना तोड़ डालिए मस्जिद को ढाइएदिल को न तोड़िए ये ख़ुदा का मक़ाम है
उन के रुख़्सार पे ढलके हुए आँसू तौबामैं ने शबनम को भी शोलों पे मचलते देखा
ख़ुदा करे न ढले धूप तेरे चेहरे कीतमाम उम्र तिरी ज़िंदगी की शाम न हो
जज़्बा-ए-इश्क़ सलामत है तो इंशा-अल्लाहकच्चे धागे से चले आएँगे सरकार बंधे
आ गई याद शाम ढलते हीबुझ गया दिल चराग़ जलते ही
कभी तो शाम ढले अपने घर गए होतेकिसी की आँख में रह कर सँवर गए होते
हम बहुत दूर निकल आए हैं चलते चलतेअब ठहर जाएँ कहीं शाम के ढलते ढलते
ये जब है कि इक ख़्वाब से रिश्ता है हमारादिन ढलते ही दिल डूबने लगता है हमारा
कुछ और तरह की मुश्किल में डालने के लिएमैं अपनी ज़िंदगी आसान करने वाला हूँ
मिरा गुमान है शायद ये वाक़िआ' हो जाएकि शाम मुझ में ढले और सब फ़ना हो जाए
शाम ढले इक वीरानी सी साथ मिरे घर जाती हैमुझ से पूछो उस की हालत जिस की माँ मर जाती है
शाम ढले ये सोच के बैठे हम अपनी तस्वीर के पाससारी ग़ज़लें बैठी होंगी अपने अपने मीर के पास
तेरे तो ढंग हैं यही अपना बना के छोड़ देवो भी बुरा है बावला तुझ को जो पा के छोड़ दे
क़यामत है तिरी उठती जवानीग़ज़ब ढाने लगीं नीची निगाहें
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