aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "dhamke"
सियाह रात नहीं लेती नाम ढलने कायही तो वक़्त है सूरज तिरे निकलने का
मुद्दत के ब'अद आज उसे देख कर 'मुनीर'इक बार दिल तो धड़का मगर फिर सँभल गया
बुत-ख़ाना तोड़ डालिए मस्जिद को ढाइएदिल को न तोड़िए ये ख़ुदा का मक़ाम है
उन के रुख़्सार पे ढलके हुए आँसू तौबामैं ने शबनम को भी शोलों पे मचलते देखा
धमका के बोसे लूँगा रुख़-ए-रश्क-ए-माह काचंदा वसूल होता है साहब दबाव से
शाम ढलने से फ़क़त शाम नहीं ढलती हैउम्र ढल जाती है जल्दी पलट आना मिरे दोस्त
जज़्बा-ए-इश्क़ सलामत है तो इंशा-अल्लाहकच्चे धागे से चले आएँगे सरकार बंधे
आ गई याद शाम ढलते हीबुझ गया दिल चराग़ जलते ही
हम बहुत दूर निकल आए हैं चलते चलतेअब ठहर जाएँ कहीं शाम के ढलते ढलते
ये जब है कि इक ख़्वाब से रिश्ता है हमारादिन ढलते ही दिल डूबने लगता है हमारा
रात क्या सोए कि बाक़ी उम्र की नींद उड़ गईख़्वाब क्या देखा कि धड़का लग गया ताबीर का
क़यामत है तिरी उठती जवानीग़ज़ब ढाने लगीं नीची निगाहें
रात पी ज़मज़म पे मय और सुब्ह-दमधोए धब्बे जामा-ए-एहराम के
हम क्या करें सवाल ये सोचा नहीं अभीवो क्या जवाब देंगे ये धड़का अभी से है
ये हवा सारे चराग़ों को उड़ा ले जाएगीरात ढलने तक यहाँ सब कुछ धुआँ हो जाएगा
टूटती रहती है कच्चे धागे सी नींदआँखों को ठंडक ख़्वाबों को गिरानी दे
काबा के ढाने वाले वो और लोग होंगेहम कुफ़्र जानते हैं दिल तोड़ना किसी का
खिड़की ने आँखें खोलीदरवाज़े का दिल धड़का
साए ढलने चराग़ जलने लगेलोग अपने घरों को चलने लगे
वो सितम न ढाए तो क्या करे उसे क्या ख़बर कि वफ़ा है क्या?तू उसी को प्यार करे है क्यूँ ये 'कलीम' तुझ को हुआ है क्या?
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