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शेर
उस के मरहम से मुकर जाने का ग़ुस्सा था मुझे
वर्ना ये ज़ख़्म-ए-जिगर बार-ए-दिगर कुछ नहीं था
अहमद सग़ीर
शेर
न जाएगा मेरे दिल से ख़याल-ए-अबरू-ए-दिलबर
कि तेग़ों ही के साए में तो है जन्नत मुसलमाँ की