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शेर
हम में बाक़ी नहीं अब ख़ालिद-ए-जाँ-बाज़ का रंग
दिल पे ग़ालिब है फ़क़त हाफ़िज़-ए-शीराज़ का रंग
अकबर इलाहाबादी
शेर
लफ़्ज़ की हुरमत मुक़द्दम है दिल-ओ-जाँ से मुझे
सच तआ'रुफ़ है मिरे हर शे'र हर तहरीर का
अंबरीन हसीब अंबर
शेर
मस्जिद में तुझ भँवों की ऐ क़िबला-ए-दिल-ओ-जाँ
पलकें हैं मुक़तदी और पुतली इमाम गोया
सिराज औरंगाबादी
शेर
का'बा-ओ-दैर में अब ढूँड रही है दुनिया
जो दिल-ओ-जान में बस्ता था ख़ुदा और ही था