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शेर
वस्ल के दो-चार लम्हे रोज़ गिन गिन देखना
रह गया था ज़िंदगी में क्या यही दिन देखना
ज्ञानेंद्र विक्रम
शेर
अपनी मर्ज़ी से भी दो-चार क़दम चलने दे
ज़िंदगी हम तिरे कहने पे चले हैं बरसों
मोहसिन उम्मीदी बुरहानपुरी
शेर
दोस्त दो-चार निकलते हैं कहीं लाखों में
जितने होते हैं सिवा उतने ही कम होते हैं