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शेर
रहे दो दो फ़रिश्ते साथ अब इंसाफ़ क्या होगा
किसी ने कुछ लिखा होगा किसी ने कुछ लिखा होगा
हरी चंद अख़्तर
शेर
चश्म-ए-लैला का जो आलम है उन्हों की चश्म में
देखे है दो दो पहर मजनूँ ग़ज़ालाँ की तरफ़
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
दिल के आईने की हम लेते हैं तब है है ख़बर
इस पे जब दो दो वजब ये ज़ंग-ए-ग़म चढ़ जाए है
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
जवानो नज़्र दे दो अपने ख़ून-ए-दिल का हर क़तरा
लिखा जाएगा हिन्दोस्तान को फ़रमान-ए-आज़ादी