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शेर
अमीर ख़ुसरो
शेर
झूट है सब तारीख़ हमेशा अपने को दुहराती है
अच्छा मेरा ख़्वाब-ए-जवानी थोड़ा सा दोहराए तो
अंदलीब शादानी
शेर
औरों की मोहब्बत के दोहराए हैं अफ़्साने
बात अपनी मोहब्बत की होंटों पे नहीं आई
सूफ़ी ग़ुलाम मुस्ताफ़ा तबस्सुम
शेर
होता है मुसाफ़िर को दो-राहे में तवक़्क़ुफ़
रह एक है उठ जाए जो शक दैर-ओ-हरम का
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
ज़ीं-साज़ी अगर आती मुझे मैं तो मिरी जाँ
पलकों से बनाता तिरे फ़ितराक के डोरे