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शेर
इक आग ग़म-ए-तन्हाई की जो सारे बदन में फैल गई
जब जिस्म ही सारा जलता हो फिर दामन-ए-दिल को बचाएँ क्या
अतहर नफ़ीस
शेर
होंटों से उस दर्द की ख़ुशबू आ कर जिस्म में फैल गई
कितना दर्द इकट्ठा था उस ठंडी सी पेशानी में
ज़िया ज़मीर
शेर
फैल गई बालों में सपेदी चौंक ज़रा करवट तो बदल
शाम से ग़ाफ़िल सोने वाले देख तो कितनी रात रही
आरज़ू लखनवी
शेर
ख़ाना-ए-दिल पे बिना अर्श की तू रख तो सही
फैल जाती है इमारत में ज़मीं थोड़ी सी