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शेर
हर जगह चोरी का चर्चा हर जगह है लूट-मार
दिन-दहाड़े लुट रहा है हर तरफ़ फ़र्द-ए-बशर
इस्मतुल्लाह इस्मत बेग
शेर
इक मौज-ए-ख़ून-ए-ख़ल्क़ थी किस की जबीं पे थी
इक तौक़-ए-फ़र्द-ए-जुर्म था किस के गले में था
मुस्तफ़ा ज़ैदी
शेर
हर किताब-ए-सोहबत-ए-रंगीं के मअ'नी देख कर
फ़र्द-ए-तन्हाई के मज़मूँ कूँ किया हूँ इंतिख़ाब
मिर्ज़ा दाऊद बेग
शेर
'बशीर' अब गर्दिश-ए-शाम-ओ-सहर की याद बाक़ी है
कहाँ तक साथ दे सकते ज़मीन-ओ-आसमाँ अपना
बशीरून्निसा बेगम बशीर
शेर
पहले चादर की हवस में पाँव फैलाए बहुत
अब ये दुख है पाँव क्यूँ चादर से बाहर आ गया
सज्जाद बाक़र रिज़वी
शेर
सब ज़ख़्म हैं हरे है लहू से क़बा भी सुर्ख़
लाया है रंग जोश-ए-जुनूँ फिर बहार में