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शेर
आल-ए-अहमद सुरूर
शेर
कहानी है तो इतनी है फ़रेब-ए-ख़्वाब-ए-हस्ती की
कि आँखें बंद हों और आदमी अफ़्साना हो जाए
सीमाब अकबराबादी
शेर
बिल्लू को चुप कराऊँ कि मारूँ क़मर को मैं
फर्श-ए-ज़मीन धोऊँ कि मांजूँ कुकर को मैं
राजा मेहदी अली ख़ाँ
शेर
सर के नीचे ईंट रख कर उम्र भर सोया है तू
आख़िरी बिस्तर भी 'आमिर' तेरा फ़र्श-ए-ख़ाक था
मुहम्मद याक़ूब आमिर
शेर
हज़रत-ए-नासेह गर आवें दीदा ओ दिल फ़र्श-ए-राह
कोई मुझ को ये तो समझा दो कि समझाएँगे क्या
मिर्ज़ा ग़ालिब
शेर
उम्र-भर जिस के लिए आँखें रही हैं फ़र्श-ए-राह
वो अजल का क़ासिद-ए-फ़र्ख़न्दा-गाम आ ही गया
रशीद शाहजहाँपुरी
शेर
ख़फ़ा देखा है उस को ख़्वाब में दिल सख़्त मुज़्तर है
खिला दे देखिए क्या क्या गुल-ए-ताबीर-ए-ख़्वाब अपना
नज़ीर अकबराबादी
शेर
हिज्र-ए-जानाँ के अलम में हम फ़रिश्ते बन गए
ध्यान मुद्दत से छुटा आब-ओ-तआ'म-ओ-ख़्वाब का