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शेर
बिल्लू को चुप कराऊँ कि मारूँ क़मर को मैं
फर्श-ए-ज़मीन धोऊँ कि मांजूँ कुकर को मैं
राजा मेहदी अली ख़ाँ
शेर
सर के नीचे ईंट रख कर उम्र भर सोया है तू
आख़िरी बिस्तर भी 'आमिर' तेरा फ़र्श-ए-ख़ाक था
मुहम्मद याक़ूब आमिर
शेर
हज़रत-ए-नासेह गर आवें दीदा ओ दिल फ़र्श-ए-राह
कोई मुझ को ये तो समझा दो कि समझाएँगे क्या
मिर्ज़ा ग़ालिब
शेर
उम्र-भर जिस के लिए आँखें रही हैं फ़र्श-ए-राह
वो अजल का क़ासिद-ए-फ़र्ख़न्दा-गाम आ ही गया
रशीद शाहजहाँपुरी
शेर
सालिक है गरचे सैर-ए-मक़ामात-ए-दिल-फ़रेब
जो रुक गए यहाँ वो मक़ाम-ए-ख़तर में हैं
पंडित जवाहर नाथ साक़ी
शेर
हर शख़्स को फ़रेब-ए-नज़र ने किया शिकार
हर शख़्स गुम है गुम्बद-ए-जाँ के हिसार में
फ़र्रुख़ ज़ोहरा गिलानी
शेर
हर शख़्स मो'तरिफ़ कि मुहिब्ब-ए-वतन हूँ मैं
फिर अदलिया ने क्यूँ सर-ए-मक़्तल किया मुझे