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शेर
इब्न-ए-इंशा
शेर
ये फ़र्त-ए-शौक़ कि सूरत तिरी नहीं देखी
मगर जबीं तिरी ताज़ीम के लिए ख़म है
जागेश्वर दयाल नश्तर कानपुरी
शेर
वो पढ़ें भी तो खुले क्या मिरे मक्तूब का हाल
है सियह फ़र्त-ए-निगारिश से सरासर काग़ज़
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
शेर
कोई भूका जो फ़र्त-ए-ज़ोफ़ से कुछ लड़खड़ा जाए
तो दुनिया तंज़ कसती है उसे मद-मस्त कहती है
ज़मीर अतरौलवी
शेर
यार की फ़र्त-ए-नज़ाकत का हूँ मैं शुक्र-गुज़ार
ध्यान भी उस का मिरे दिल से निकलने न दिया
असद अली ख़ान क़लक़
शेर
सुकून-ए-इज़्तिराब-ए-ग़म पे चारा-साज़ तो ख़ुश हैं
दिल-ए-बेताब की लेकिन क़ज़ा मालूम होती है
अब्दुल हई आरफ़ी
शेर
कहाँ रह जाए थक कर रह-नवर्द-ए-ग़म ख़ुदा जाने
हज़ारों मंज़िलें हैं मंज़िल-ए-आराम आने तक
मुमताज़ अहमद ख़ाँ ख़ुशतर खांडवी
शेर
सिराज औरंगाबादी
शेर
सुख़न राज़-ए-नशात-ओ-ग़म का पर्दा हो ही जाता है
ग़ज़ल कह लें तो जी का बोझ हल्का हो ही जाता है