aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना हैसिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है
फुलाँ से थी ग़ज़ल बेहतर फुलाँ कीफुलाँ के ज़ख़्म अच्छे थे फुलाँ से
मल्बूस ख़ुश-नुमा हैं मगर जिस्म खोखलेछिलके सजे हों जैसे फलों की दुकान पर
इतना न पास आ कि तुझे ढूँडते फिरेंइतना न दूर जा के हमा-वक़्त पास हो
तुम्हारी फ़ाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी हैमगर ये आँकड़े झूठे हैं ये दा'वा किताबी है
गया जो हाथ से वो वक़्त फिर नहीं आताकहाँ उमीद कि फिर दिन फिरें हमारे अब
फलों के साथ कहीं घोंसले न गिर जाएँख़याल रखता हूँ पत्थर उछालता हुआ मैं
ख़ाक मैं उस की जुदाई में परेशान फिरूँजब कि ये मिलना बिछड़ना मिरी मर्ज़ी निकला
साए की तरह साथ फिरें सर्व ओ सनोबरतू इस क़द-ए-दिलकश से जो गुलज़ार में आवे
उन से मिल कर और भी कुछ बढ़ गईंउलझनें फ़िक्रें क़यास-आराइयाँ
कल जहाँ ज़ुल्म ने काटी थीं सरों की फ़सलेंनम हुई है तो उसी ख़ाक से लश्कर निकला
आँखों में है लिहाज़ तबस्सुम-फ़िज़ा हैं लबशुक्र-ए-ख़ुदा के आज तो कुछ राह पर हैं आप
ये जिस की बेटी के सर की चादर कई जगह से फटी हुई हैतुम उस के गाँव में जा के देखो तो आधी फ़स्लें कपास होंगी
ये अब्र है या फ़ील-ए-सियह-मस्त है साक़ीबिजली के जो है पाँव में ज़ंजीर हवा पर
कल चाँद डगमगा के समुंदर में गिर गयाफैले हुए सितारों की बंदिश के बावजूद
अब कहाँ तक पत्थरों की बंदगी करता फिरूँदिल से जिस दम भी पुकारूँगा ख़ुदा मिल जाएगा
फैले हैं सारे शहर में क़िस्से अजीब सेगुज़रा है जब भी फूल सा चेहरा क़रीब से
पड़े हैं नफ़रत के बीच दिल में बरस रहा है लहू का सावनहरी-भरी हैं सरों की फ़सलें बदन पे ज़ख़्मों के गुल खिले हैं
आँखें फूटें जो झपकती भी होंशब-ए-तन्हाई में कैसा सोना
ऑफ़िस की फ़ाइलों में तिरी ज़ुल्फ़ का ख़यालदिल अपने काम से है दिमाग़ अपने काम से
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