aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "fossils"
फ़सील-ए-जिस्म पे ताज़ा लहू के छींटे हैंहुदूद-ए-वक़्त से आगे निकल गया है कोई
मैं अगर टूटा तो सारा शहर बिखरेगा 'नबील'ऐसा पत्थर हूँ फ़सील-ए-शहर की बुनियाद का
बग़ैर सम्त के चलना भी काम आ ही गयाफ़सील-ए-शहर के बाहर भी एक दुनिया थी
बला का हब्स था पर नींद टूटती ही न थीन कोई दर न दरीचा फ़सील-ए-ख़्वाब में था
शब-ए-व'अदा फ़सील-ए-हिज्र से आगे चमकता है तिरा इस्म-ए-सितारा-जूकि जैसे कोई पैवंद-ए-रिदा-ए-सुब्ह आ जाए किसी क़िंदील की ज़द में
उलझ रहा था अभी ख़्वाब की फ़सील से मैंकि ना-रसाई ने इक शब मुझे रसाई दी
वक़्त ही वो ख़त-ए-फ़ासिल है कि ऐ हम-नफ़सोदूर है मौज-ए-बला और किनारे हुए लोग
बुरीदा-सर को सजा दे फ़सील-ए-नेज़ा परदरीदा जिस्म को फिर अर्सा-ए-क़िताल में रख
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