aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "gard-e-kuu-e-yaar"
किस शान से गए हैं शहीदान-ए-कू-ए-यारक़ातिल भी हाथ उठा के शरीक-ए-दुआ हुए
पामाल हो के भी न उठा कू-ए-यार सेमैं उस गली में साया-ए-दीवार हो गया
पूछा सबा से उस ने पता कू-ए-यार कादेखो ज़रा शुऊ'र हमारे ग़ुबार का
छानी है ख़ाक हम ने बहुत कू-ए-यार की'जा’फ़र' इस 'आशिक़ी से किसी को अमाँ नहीं
आदम से बाग़-ए-ख़ुल्द छुटा हम से कू-ए-यारवो इब्तिदा-ए-रंज है ये इंतिहा-ए-रंज
राह से दैर-ओ-हरम की है जो कू-ए-यार मेंहै वही दीं-दार गर कुफ़्फ़ार आता है नज़र
है जब से दस्त-गीर-ए-जुनूँ कू-ए-यार मेंफिरता हूँ एक पाँव से परकार की तरह
दिल-दुखे रोए हैं शायद इस जगह ऐ कू-ए-दोस्तख़ाक का इतना चमक जाना ज़रा दुश्वार था
ऐ सज्दा-फ़रोश-ए-कू-ए-बुताँ हर सर के लिए इक चौखट हैये भी कोई शान-ए-इश्क़ हुई जिस दर पे गए सर फोड़ लिया
ये क़दम क़दम बलाएँ ये सवाद-ए-कू-ए-जानाँवो यहीं से लौट जाए जिसे ज़िंदगी हो पियारी
ऐ आफ़्ताब हादी-ए-कू-ए-निगार होआए भला कभी तो हमारे भी काम दिन
अब कौन फिरे कू-ए-बुत-ए-दुश्मन-ए-दीं सेअल्लाह के घर क्यूँ न चले जाएँ यहीं से
गली के बाहर तमाम मंज़र बदल गए थेजो साया-ए-कू-ए-यार उतरा तो मैं ने देखा
चाँदनी में साया-हा-ए-काख़-ओ-कू में घूमिएफिर किसी को चाहने की आरज़ू में घूमिए
अब क़ुर्बत-ओ-सोहबत-ए-यार कहाँ लब ओ आरिज़ ओ ज़ुल्फ़ ओ कनार कहाँअब अपना भी 'मीर' सा आलम है टुक देख लिया जी शाद किया
उस को मुद्दत हुई सब्र करते हुए आज कू-ए-वफ़ा से गुज़रते हुएपूछ कर उस गदा का ठिकाना सजन अपने 'इंशा' को भी देख आना सजन
कुछ वक़्त अपने साथ गुज़ारूँगा मैं 'ज़मीर'ख़ुद से अगर मिला जो कभी कू-ए-यार में
कितना है बद-नसीब 'ज़फ़र' दफ़्न के लिएदो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में
मुझ को नहीं क़ुबूल दो-आलम की वुसअतेंक़िस्मत में कू-ए-यार की दो-गज़ ज़मीं रहे
लिबास-ए-काबा का हासिल किया शरफ़ उस नेजो कू-ए-यार में काली कोई घटा आई
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