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शेर
जमील मज़हरी
शेर
वहाँ ज़ेर-ए-बहस आते ख़त-ओ-ख़ाल ओ ख़ू-ए-ख़ूबाँ
ग़म-ए-इश्क़ पर जो 'अनवर' कोई सेमिनार होता
अनवर मसूद
शेर
डराता है हमें महशर से तू वाइज़ अरे जा भी
ये हंगामे तो हम ने रोज़ कू-ए-यार में देखे