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शेर
इब्न-ए-इंशा
शेर
क्यूँ ध्यान बटाती है मिरा गर्दिश-ए-दुनिया
हट जा कि न फ़र्क़ आए मिरी लग़्ज़िश-ए-पा में
सिराज लखनवी
शेर
है इन दिनों में गर्दिश-ए-चश्म-ए-बुताँ का दौर
तेरा ज़माना गर्दिश-ए-दौराँ निकल गया
क़ुर्बान अली सालिक बेग
शेर
मेरे नाले के न क्यूँ हो चर्ख़-ए-अख़्ज़र ज़ेर-ए-पा
ख़ुत्बा ख़्वान-ए-इश्क़ है रखता है मिम्बर ज़ेर-ए-पा
शाह नसीर
शेर
'बर्क़' उफ़्तादा वो हूँ सल्तनत-ए-आलम में
ताज-ए-सर इज्ज़ से नक़्श-ए-कफ़-ए-पा होता है
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
शेर
गर्दिश-ए-अय्याम से चलती है नब्ज़-ए-काएनात
वक़्त का पहिया रुका तो ज़िंदगी रुक जाएगी
लतीफ़ शाह शाहिद
शेर
'बशीर' अब गर्दिश-ए-शाम-ओ-सहर की याद बाक़ी है
कहाँ तक साथ दे सकते ज़मीन-ओ-आसमाँ अपना
बशीरून्निसा बेगम बशीर
शेर
बे-समर पेड़ों को चूमेंगे सबा के सब्ज़ लब
देख लेना ये ख़िज़ाँ बे-दस्त-ओ-पा रह जाएगी
अमजद इस्लाम अमजद
शेर
ज़बान-ए-हाल से ये लखनऊ की ख़ाक कहती है
मिटाया गर्दिश-ए-अफ़्लाक ने जाह-ओ-हशम मेरा