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शेर
छेड़ती हैं कभी लब को कभी रुख़्सारों को
तुम ने ज़ुल्फ़ों को बहुत सर पे चढ़ा रक्खा है
ग़ौस ख़ाह मख़ाह हैदराबादी
शेर
परेशानी से सर के बाल तक सब झड़ गए लेकिन
पुरानी जेब में कंघी जो पहले थी सो अब भी है
ग़ौस ख़ाह मख़ाह हैदराबादी
शेर
क़ातिल ने मुझ को ग़ौस का क्या मर्तबा दिया
सर है कहीं बदन है कहीं दस्त-ओ-पा कहीं
डॉन डिसिल्वा फ़ितरत
शेर
ज़माने का चलन क्या पूछते हो 'ख़्वाह-मख़ाह' मुझ से
वही रफ़्तार बे-ढंगी जो पहले थी सो अब भी है
ग़ौस ख़ाह मख़ाह हैदराबादी
शेर
पहले पहले शौहर को हर मौसम भीगा लगता है
यूँ समझो बिल्ली के भागों टूटा छीका लगता है
ग़ौस ख़ाह मख़ाह हैदराबादी
शेर
समझ ले नाम तेरा ही लिखा है दाने दाने पर
कभी मत सोच मेदे के लिए अच्छा बुरा क्या है
ग़ौस ख़ाह मख़ाह हैदराबादी
शेर
उड़ा कर देख ले कोई पतंगें अपनी शेख़ी की
बुलंदी पर अगर हों भी तो कन्ने काट सकता हूँ
ग़ौस ख़ाह मख़ाह हैदराबादी
शेर
एक मुद्दत से ख़यालों में बसा है जो शख़्स
ग़ौर करते हैं तो उस का कोई चेहरा भी नहीं
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
शेर
सिर्फ़ शिकवे दिख रहे हैं ये नहीं दिखता तुझे
तुझ से शिकवे रखने वाला तेरा दीवाना भी है