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शेर
मिरी 'आशिक़ी सही बे-असर तिरी दिलबरी ने भी क्या किया
वही मैं रहा वही बे-दिली वही रंग-ए-लैल-ओ-नहार है
ए. डी. अज़हर
शेर
'अज़फ़री' ग़ुंचा-ए-दिल बंद और आई है बहार
सैर-ए-गुल को कि ये शायद ब-तकल्लुफ़ खिल ले
मिर्ज़ा ज़हीरुद्दीन अज़फ़री
शेर
यही हैं यादगार-ए-ग़ुंचा-ओ-गुल इस ज़माने में
इन्हीं सूखे हुए काँटों से ज़िक्र-ए-गुल्सिताँ लिखिए
अख़्तर अंसारी अकबराबादी
शेर
अज़ीज़ान-ए-वतन को ग़ुंचा ओ बर्ग ओ समर जाना
ख़ुदा को बाग़बाँ और क़ौम को हम ने शजर जाना