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शेर
आज क्या जाने वो क्यूँ आराम-ए-जाँ आया नहीं
हर्फ़-ए-रंजिश कल तो कोई दरमियाँ आया नहीं
मिर्ज़ा अली लुत्फ़
शेर
वो सुन रहा है मिरी बे-ज़बानियों की ज़बाँ
जो हर्फ़-ओ-सौत-ओ-सदा-ओ-ज़बाँ से पहले था
अकबर अली खान अर्शी जादह
शेर
उस हर्फ़-ए-बा-सफ़ा ने तो सूली चढ़ा दिया
वो एक हर्फ़-ए-हक़ जो मिरे हाफ़िज़े में था
अहमद वक़ास महरवी
शेर
पत्थरों पर नक़्श करता हूँ मैं हर्फ़-ए-ईन-ओ-आँ
क्या पता मिट जाएगा या कुछ बना रह जाएगा
अहमद नियाज़ रज़्ज़ाक़ी
शेर
अश्क-ए-ग़म उक़्दा-कुशा-ए-ख़लिश-ए-जाँ निकला
जिस को दुश्वार मैं समझा था वो आसाँ निकला