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शेर
भर के साक़ी जाम-ए-मय इक और ला और जल्द ला
उन नशीली अँखड़ियों में फिर हिजाब आने को है
फ़ानी बदायुनी
शेर
इक जाम-ए-मय की ख़ातिर पलकों से ये मुसाफ़िर
जारोब-कश रहा है बरसों दर-ए-मुग़ाँ का
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
जाम-ब-दस्त-ओ-मय-ब-जाम यूँ ही गुज़ार सुब्ह-ओ-शाम
ज़ीस्त की तल्ख़ियाँ मुदाम पी के पिला के भूल जा
ख़ुमार बाराबंकवी
शेर
गुल खिलाए न कहीं फ़ित्ना-ए-दौराँ कुछ और
आज-कल दौर-ए-मय-ओ-जाम से जी डरता है
अख़्तर अंसारी अकबराबादी
शेर
मिरी शाएरी में न रक़्स-ए-जाम न मय की रंग-फ़िशानियाँ
वही दुख-भरों की हिकायतें वही दिल-जलों की कहानियाँ
कलीम आजिज़
शेर
क्या कहें बज़्म में कुछ ऐसी जगह बैठे हैं
जाम-ए-मय हादसा बन जाए तो हम तक पहुँचे