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शेर
तू है मअ'नी पर्दा-ए-अल्फ़ाज़ से बाहर तो आ
ऐसे पस-मंज़र में क्या रहना सर-ए-मंज़र तो आ
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
शेर
हाए ये हुस्न-ए-तसव्वुर का फ़रेब-ए-रंग-ओ-बू
मैं ये समझा जैसे वो जान-ए-बहार आ ही गया
जिगर मुरादाबादी
शेर
ये किब्र-ओ-नाज़ अब क्या जब सर-ए-बाज़ार तुम निकले
मगर हाँ ये कहो बहुतों ने देखा कम ने पहचाना
इज्तिबा रिज़वी
शेर
तम्हीद थी जुनूँ की गरेबाँ हुआ जो चाक
यानी ये ख़ैर-मक़्दम-ए-फ़स्ल-ए-बहार था
मुंशी नौबत राय नज़र लखनवी
शेर
फ़ैज़-ए-अय्याम-ए-बहार अहल-ए-क़फ़स क्या जानें
चंद तिनके थे नशेमन के जो हम तक पहुँचे
हबीब अहमद सिद्दीक़ी
शेर
करते हैं अर्बाब-ए-दिल अंदाज़ा-ए-जोश-ए-बहार
मेरा दामन देख कर मेरा गरेबाँ देख कर