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शेर
न रह जावे कहीं तू ज़ाहिदा महरूम रहमत से
गुनहगारों में समझा करियो अपनी बे-गुनाही को
ख़्वाजा मीर दर्द
शेर
क्यूँ तिरी थोड़ी सी गर्मी सीं पिघल जावे है जाँ
क्या तू नें समझा है आशिक़ इस क़दर है मोम का
आबरू शाह मुबारक
शेर
ये वो आँसू हैं जिन से ज़ोहरा आतिशनाक हो जावे
अगर पीवे कोई उन को तो जल कर ख़ाक हो जावे
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
शेर
बिन देखे उस के जावे रंज ओ अज़ाब क्यूँ कर
वो ख़्वाब में तो आवे पर आवे ख़्वाब क्यूँ कर
जुरअत क़लंदर बख़्श
शेर
दिल-लगी के वास्ते देहली में है मटिया-महल
कौन जावे ख़ाक उड़ाने मुल्क-ए-बीकानेर को
किशन लाल तालिब देहलवी
शेर
भूल जावे साहिब-ए-इक़बाल अपनी सर-कशी
उस को दिखलावे अगर मेरी बद-इक़बाली दिमाग़
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
सादिक़ से बस इक आन में हो जावे तू काज़िब
दिखलाऊँ अगर तुझ को मैं उस ज़ुल्फ़ का ख़म सुब्ह
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
मिज़्गाँ-ज़दन से कम है ज़मान-ए-नमाज़-ए-इश्क़
हो जावे फ़ौत वक़्त ही जब तक वज़ू करें