aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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हसीं तो और हैं लेकिन कोई कहाँ तुझ साजो दिल जलाए बहुत फिर भी दिलरुबा ही लगे
चूल्हे नहीं जलाए कि बस्ती ही जल गईकुछ रोज़ हो गए हैं अब उठता नहीं धुआँ
ज़माना याद करे या सबा करे ख़ामोशहम इक चराग़-ए-मोहब्बत जलाए जाते हैं
जलाए रक्खूँ-गी सुब्ह तक मैं तुम्हारे रस्तों में अपनी आँखेंमगर कहीं ज़ब्त टूट जाए तो बारिशें भी शुमार करना
ये और बात कि रस्ते भी हो गए रौशनदिए तो हम ने तिरे वास्ते जलाए थे
बिगाड़ कर बनाए जा उभार कर मिटाए जाकि मैं तिरा चराग़ हूँ जलाए जा बुझाए जा
वो जिस की राह में मैं ने दिए जलाए थेगया वो शख़्स मुझे छोड़ कर अँधेरे में
जिस हवा ने मुझे जलाए रखाफिर उसी ने बुझा दिया मुझ को
जलाए मेरी ही सिगरेट मिरी अयादत परये मेरा दोस्त भी है काइयाँ अजीब-ओ-ग़रीब
आँख से क़त्ल करे लब से जलाए मुर्देशोबदा-बाज़ का अदना सा करिश्मा देखो
हमारे शहर में है वो गुरेज़ का आलमचराग़ भी न जलाए चराग़ से कोई
यही है रस्म-ए-ज़माना तो फिर गिला कैसाकोई जलाए चराग़ों को और बुझाए कोई
दिए जलाए उम्मीदों ने दिल के गिर्द बहुतकिसी तरफ़ से न इस घर में रौशनी आई
एक तुम्हारी याद ने लाख दिए जलाए हैंआमद-ए-शब के क़ब्ल भी ख़त्म-ए-सहर के बाद भी
वही दिया कि थीं आजिज़ हवाएँ जिन से 'उमर'किसी के फिर न जलाए जला बुझा ऐसा
चिराग़-दाग़ मैं दिन से जलाए बैठा हूँसुना है जो शब-ए-फ़ुर्क़त सियाह होती है
बुझीं शमएँ तो दिल जलाए हैंयूँ अंधेरों में रौशनी की है
इक शम-ए-आरज़ू की हक़ीक़त ही क्या मगरतूफ़ाँ में हम चराग़ जलाए हुए तो हैं
रंग क्या अजब दिया मेरी बेवफ़ाई कोउस ने यूँ किया कि मेरे ख़त जलाए ऊद में
हिज्र की रात वो ख़त भी जलाए तो कैसेउस के घर में कोई आतिश-दान नहीं
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