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शेर
झाड़ कर गर्द-ए-ग़म-ए-हस्ती को उड़ जाऊँगा मैं
बे-ख़बर ऐसी भी इक परवाज़ आती है मुझे
अब्दुल हमीद अदम
शेर
उम्मीद की सूखती शाख़ों से सारे पत्ते झड़ जाएँगे
इस ख़ौफ़ से अपनी तस्वीरें हम साल-ब-साल बनाते हैं
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
शेर
परेशानी से सर के बाल तक सब झड़ गए लेकिन
पुरानी जेब में कंघी जो पहले थी सो अब भी है
ग़ौस ख़ाह मख़ाह हैदराबादी
शेर
हरगिज़ किया न बाद-ए-ख़िज़ाँ का भी इंतिज़ार
वो ताज़ा गुल था मैं कि खिला और झड़ गया
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
हम सहरा वाले हैं बदरा ये प्रेम की रिम-झिम और कहीं
आना है यहाँ तो आईयो तू जम कर झम-झम करने के लिए
प्रियंवदा इल्हान
शेर
ख़ुदाया आज के शौहर हैं या मासूम बच्चे हैं
ज़रा सा घूर ले बीवी तो झट ये सहम जाते हैं