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शेर
क्या ख़ूब ‘बर्क़’ तू ने दिखाया है ज़ोर-ए-तब्अ
काग़ज़ पे रख दिया है कलेजा निकाल के
मुंशी राम रखा बर्क़
शेर
जो शैख़-ए-शहर आया हम से औबाशों की मज्लिस में
अगर धूलें नहीं तो गालियाँ दो-चार खा निकला
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
मेरे दिल-ए-शिकस्ता को कहती है देख ख़ल्क़
क्या ज़ोर-ए-आईना है ये होवे अगर दुरुस्त
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
शिकस्त-ए-साग़र-ए-दिल की सदाएँ सुन रहा हूँ मैं
ज़रा पूछो तो साक़ी से कि पैमानों पे क्या गुज़री
वहशी कानपुरी
शेर
ख़त्म करना चाहता हूँ पेच-ओ-ताब-ए-ज़िंदगी
याद-ए-गेसू ज़ोर-ए-बाज़ू बन मिरे शाने में आ