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शेर
कलीम आजिज़
शेर
याँ रख़्ना-हा-ए-सीना कुदूरत से हैं फटे
वाँ हो गए हैं रौज़न-ए-दीवार-ए-यार बंद
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
मूसा ने कोह-ए-तूर पे देखा जो कुछ वही
आता है आरिफ़ों को नज़र संग-ओ-ख़िश्त में
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
ज़रा पर्दा हटा दो सामने से बिजलियाँ चमकें
मिरा दिल जल्वा-गाह-ए-तूर बन जाए तो अच्छा हो