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शेर
इन गली कूचों में बहनों का मुहाफ़िज़ कौन है
कस्ब-ए-ज़र की दौड़ में बस्ती से माँ-जाए गए
अल्लामा तालिब जौहरी
शेर
मुक़ाबिल हो हमारे कस्ब-ए-तक़लीदी से क्या ताक़त
अभी हम महव कर देते हैं आईने को इक हू में
इश्क़ औरंगाबादी
शेर
ऐ 'फ़ज़ा' इतनी कुशादा कब थी मअ'नी की जिहत
मेरे लफ़्ज़ों से उफ़ुक़ इक दूसरा रौशन हुआ
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
शेर
ख़ार-ओ-ख़स-ओ-ख़ाशाक तो जानें एक तुझी को ख़बर न मिले
ऐ गुल-ए-ख़ूबी हम तो अबस बदनाम हुए गुलज़ार के बीच