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शेर
उन से मिलने का मंज़र भी दिल-चस्प था ऐ 'असर'
इस तरफ़ से बहारें चलीं और उधर से खिज़ाएँ चलीं
इज़हार असर
शेर
करता है ऐ 'असर' दिल-ए-ख़ूँ-गश्ता का गिला
आशिक़ वो क्या कि ख़स्ता-ए-तेग़-ए-जफ़ा न हो
इम्दाद इमाम असर
शेर
मिरी 'आशिक़ी सही बे-असर तिरी दिलबरी ने भी क्या किया
वही मैं रहा वही बे-दिली वही रंग-ए-लैल-ओ-नहार है
ए. डी. अज़हर
शेर
सुना किस ने हाल मेरा कि जूँ अब्र वो न रोया
रखे है मगर ये क़िस्सा असर-ए-दुआ-ए-बाराँ
बन्द्र इब्न-ए-राक़िम
शेर
यार ने ख़त्त-ओ-कबूतर के किए हैं टुकड़े
पुर्ज़े काग़ज़ के करें जम्अ' कि पर जम्अ' करें
किशन कुमार वक़ार
शेर
कुछ नहीं है तिरे हाथों में लकीरों के सिवा
बात नासेह की है लेकिन ख़त-ए-तक़्दीर भी है
कलीम अहमदाबादी
शेर
हरगिज़ न मुझ से साफ़ हुआ यार या नसीब
ख़त भी लिखा जो उस ने तो ख़त्त-ए-ग़ुबार में