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शेर
यार ने ख़त्त-ओ-कबूतर के किए हैं टुकड़े
पुर्ज़े काग़ज़ के करें जम्अ' कि पर जम्अ' करें
किशन कुमार वक़ार
शेर
कुछ नहीं है तिरे हाथों में लकीरों के सिवा
बात नासेह की है लेकिन ख़त-ए-तक़्दीर भी है
कलीम अहमदाबादी
शेर
हरगिज़ न मुझ से साफ़ हुआ यार या नसीब
ख़त भी लिखा जो उस ने तो ख़त्त-ए-ग़ुबार में
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
ऐ मुहिब्बो राह-ए-उल्फ़त में हर इक शय है मबाह
किस ने खींचा है ख़त-ए-हिज्राँ तुम्हारे दरमियाँ
अब्दुल अज़ीज़ ख़ालिद
शेर
शायद मिज़ाज हम से मुकद्दर है यार का
लिक्खा है उस ने हम को ब-ख़्त्त-ए-ग़ुबार ख़त