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शेर
वसवसे दिल में न रख ख़ौफ़-ए-रसन ले के न चल
अज़्म-ए-मंज़िल है तो हम-राह थकन ले के न चल
अबरार किरतपुरी
शेर
न ख़ौफ़-ए-बर्क़ न ख़ौफ़-ए-शरर लगे है मुझे
ख़ुद अपने बाग़ को फूलों से डर लगे है मुझे
मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद
शेर
बीच में है मेरे उस के तू ही ऐ आह-ए-हज़ीं
सुल्ह क्यूँकर होवे जब तक दरमियाँ कोई न हो
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
शेर
मुँह ज़र्द ओ आह-ए-सर्द ओ लब-ए-ख़ुश्क ओ चश्म-ए-तर
सच्ची जो दिल-लगी है तो क्या क्या गवाह है
नज़ीर अकबराबादी
शेर
नहीं मिलती उन्हें मंज़िल जिन्हें ख़ौफ़-ए-हवादिस है
जो मौजों से नहीं डरते नदी को पार करते हैं
अब्दुल मजीद ख़ाँ मजीद
शेर
बैत-बहसी न कर ऐ फ़ाख़्ता गुलशन में कि आज
मिसरा-ए-सर्व से मौज़ूँ है मिरा मिसरा-ए-आह