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शेर
जो वालिद का बुढ़ापे में सहारा बन नहीं सकता
जो सच पूछो तो हो लख़्त-ए-जिगर अच्छा नहीं लगता
अनवार फ़िरोज़
शेर
क़त्ल अमीर-ए-शहर का लाडला बेटा कर गया
जुर्म मगर ग़रीब के लख़्त-ए-जिगर के सर गया
मिर्ज़ा शारिक़ लाहरपुरी
शेर
हम गिरफ़्तारों को अब क्या काम है गुलशन से लेक
जी निकल जाता है जब सुनते हैं आती है बहार
मज़हर मिर्ज़ा जान-ए-जानाँ
शेर
न लेट इस तरह मुँह पर ज़ुल्फ़ को बिखरा के ऐ ज़ालिम
ज़रा उठ बैठ तू इस दम कि दोनों वक़्त मिलते हैं
मीर हसन
शेर
क़ासिद को उस ने जाते ही रुख़्सत किया था लेक
बद-ज़ात माँदगी के बहाने से रह गया