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शेर
सिर्फ़ अल्फ़ाज़ पे मौक़ूफ़ नहीं लुत्फ़-ए-सुख़न
आँख ख़ामोश अगर है तो ज़बाँ कुछ भी नहीं
मुग़ीसुद्दीन फ़रीदी
शेर
'वहशत' सुख़न ओ लुत्फ़-ए-सुख़न और ही शय है
दीवान में यारों के तो अशआर बहुत हैं
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
शेर
देर तक ज़ब्त-ए-सुख़न कल उस में और हम में रहा
बोल उठे घबरा के जब आख़िर के तईं दम रुक गए
मिर्ज़ा अली लुत्फ़
शेर
न कर ऐ 'लुत्फ' नाहक़ रहरवान-ए-दैर से हुज्जत
यही रस्ता तो खा कर फेर है का'बे को जा निकला
मिर्ज़ा अली लुत्फ़
शेर
इब्न-ए-इंशा
शेर
बे-तकल्लुफ़ आ गया वो मह दम-ए-फ़िक्र-ए-सुख़न
रह गया पास-ए-अदब से क़ाफ़िया आदाब का
मुनीर शिकोहाबादी
शेर
लुत्फ़-ए-शब-ए-मह ऐ दिल उस दम मुझे हासिल हो
इक चाँद बग़ल में हो इक चाँद मुक़ाबिल हो