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शेर
मज़ा देखा किसी को ऐ परी-रू मुँह लगाने का
अब आईना भी कहता है कि मैं मद्द-ए-मुक़ाबिल हूँ
सरदार गंडा सिंह मशरिक़ी
शेर
चर्ख़ को मद्द-ए-नज़र है खींचना पूरी शबीह
माह-ए-नौ तो सिर्फ़ ख़ाका है तिरी तस्वीर का