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शेर
बज़्म-ए-फ़लक में कौन है उस की रा'नाई का महरम-ए-राज़
किस को अपने दामन-ए-दिल के दाग़ दिखाएगा महताब
शहला कलीम
शेर
गरचे है तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल पर्दा-दार-ए-राज़-ए-इश्क़
पर हम ऐसे खोए जाते हैं कि वो पा जाए है
मिर्ज़ा ग़ालिब
शेर
कभी हो सका तो बताऊँगा तुझे राज़-ए-आलम-ए-ख़ैर-ओ-शर
कि मैं रह चुका हूँ शुरूअ' से गहे ऐज़्द-ओ-गहे अहरमन
फ़िराक़ गोरखपुरी
शेर
हुज़ूर-ए-दुख़्तर-ए-रज़ हाथ पाँव काँपते हैं
तमाम मस्तों को रअशा है रू-ब-रू-ए-शराब
मुनीर शिकोहाबादी
शेर
ज़ब्त-ए-राज़-ए-ग़म पे सौ जानें भी कर देते निसार
क्या बताएँ बस ज़बाँ पर उन का नाम आ ही गया
रशीद शाहजहाँपुरी
शेर
पास-ए-अदब से छुप ना सका राज़-ए-हुस्न-ओ-‘इश्क़
जिस जा तुम्हारा नाम सुना सर झुका दिया
जिगर मुरादाबादी
शेर
आले रज़ा रज़ा
शेर
सुख़न राज़-ए-नशात-ओ-ग़म का पर्दा हो ही जाता है
ग़ज़ल कह लें तो जी का बोझ हल्का हो ही जाता है
शाज़ तमकनत
शेर
भूल के कभी न फ़ाश कर राज़-ओ-नियाज़-ए-आशिक़ी
वो भी अगर हों सामने आँख उठा के भी न देख
आरज़ू सहारनपुरी
शेर
राज़-ए-ग़म-ए-उल्फ़त को ये दुनिया न समझ ले
आँसू मिरे दामन में तुम्हारे भी मिले हैं