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शेर
धूम कर रक्खी थी कल रिंदों ने बज़्म-ए-वा'ज़ में
पगड़ी ग़ाएब थी जनाब-ए-शैख़ की गुल था चराग़
नातिक़ गुलावठी
शेर
इधर कोने में जो इक मज्लिस-ए-बेदार बैठी है
किराए पर इलेक्शन के लिए तय्यार बैठी है
सय्यद ज़मीर जाफ़री
शेर
ख़ुदा रक्खे ये पास-ए-वज़्अ' में तुम से भी बढ़ कर है
तुम्हीं आ कर निकालोगे तो अरमाँ दिल से निकलेगा
नसीम नूर महली
शेर
ज़मीं के मालिक-ओ-मुख़्तार की सुन्नत समझ कर
खड़ावें पहन लीं और बकरियाँ रक्खी हुई हैं
आसिम नदीम आसी
शेर
आया है मिरे दिल का ग़ुबार आँसुओं के साथ
लो अब तो हुई मालिक-ए-ख़ुश्की-ओ-तरी आँख