aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "marhabaa"
रहे न जान तो क़ातिल को ख़ूँ-बहा दीजेकटे ज़बान तो ख़ंजर को मरहबा कहिए
किया ज़िब्ह क़ातिल ने रुक रुक के ऐसाज़बाँ थक गई मरहबा कहते कहते
मोअज़्ज़िन मर्हबा बर-वक़्त बोलातिरी आवाज़ मक्के और मदीने
फैला फ़ज़ा में नग़्मा-ए-ज़ंजीर-ए-मर्हबाज़िंदाँ में घुट के रह न सकी ज़िंदगी की बात
मज़हबी बहस मैं ने की ही नहींफ़ालतू अक़्ल मुझ में थी ही नहीं
दिल की वीरानी का क्या मज़कूर हैये नगर सौ मर्तबा लूटा गया
सफ़र में ऐसे कई मरहले भी आते हैंहर एक मोड़ पे कुछ लोग छूट जाते हैं
वही कारवाँ वही रास्ते वही ज़िंदगी वही मरहलेमगर अपने अपने मक़ाम पर कभी तुम नहीं कभी हम नहीं
तलाश-ए-रिज़्क़ का ये मरहला अजब है कि हमघरों से दूर भी घर के लिए बसे हुए हैं
अभी हैं क़ुर्ब के कुछ और मरहले बाक़ीकि तुझ को पा के हमें फिर तिरी तमन्ना है
वक़्त हर ज़ख़्म का मरहम तो नहीं बन सकतादर्द कुछ होते हैं ता-उम्र रुलाने वाले
मिटा दे अपनी हस्ती को अगर कुछ मर्तबा चाहेकि दाना ख़ाक में मिल कर गुल-ओ-गुलज़ार होता है
हज़ार मर्तबा बेहतर है बादशाही सेअगर नसीब तिरे कूचे की गदाई हो
तअल्लुक़ तोड़ने में पहल मुश्किल मरहला थाचलो हम ने तुम्हारा बोझ हल्का कर दिया है
हर बात जानते हुए दिल मानता न थाहम जाने ए'तिबार के किस मरहले में थे
ये कैसे मरहले में फँस गया है मेरा घर मालिकअगर छत को बचा भी लूँ तो फिर दीवार जाती है
मरहम-ए-हिज्र था अजब इक्सीरअब तो हर ज़ख़्म भर गया होगा
इश्क़ का अब मर्तबा पहुँचा मुक़ाबिल हुस्न केबन गए बुत हम भी आख़िर उस सनम की याद में
मर्तबा आज भी ज़माने मेंप्यार से आजिज़ी से मिलता है
मैं जब कभी उस से पूछता हूँ कि यार मरहम कहाँ है मेरातो वक़्त कहता है मुस्कुरा कर जनाब तय्यार हो रहा है
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