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शेर
मरजा-ए-गब्र-ओ-मुसलमाँ है वो बुत नाम-ए-ख़ुदा
भेजते हैं उसे हिन्दू ओ मुसलमाँ काग़ज़
मातम फ़ज़ल मोहम्मद
शेर
बज़्म-ए-अग़्यार में उस ने मुझे दरयाफ़्त किया
बा'द मुद्दत के उसे याद मिरी आई है