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शेर
जब आ जाती है दुनिया घूम फिर कर अपने मरकज़ पर
तो वापस लौट कर गुज़रे ज़माने क्यूँ नहीं आते
इबरत मछलीशहरी
शेर
अपने मरकज़ की तरफ़ माइल-ए-परवाज़ था हुस्न
भूलता ही नहीं आलम तिरी अंगड़ाई का
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
शेर
शकील बदायूनी
शेर
दिल कि है सरमाया-दार-ए-इज़्ज़त ओ नामूस-ए-हुस्न
है यही मरकज़ यही है दायरा मेरे लिए
मसलिहुद्दी अहमद असीर काकोरवी
शेर
तिरा ग़म तिरी मोहब्बत है जबीन-ए-दिल का मरकज़
मिरा ज़ौक़-ए-सज्दा-रेज़ी अभी दर बदर नहीं है
असर बहराइची
शेर
तिरे माथे पे ये आँचल बहुत ही ख़ूब है लेकिन
तू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था