aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "markaz-e-jaa.n"
मरकज़-ए-जाँ तो वही तू है मगर तेरे सिवालोग हैं और भी इस याद पुरानी में कहीं
बचाएँ आबरू जिस्मों की भीड़ में कैसेहै खोलनी गिरह-ए-जाँ मगर कहाँ खोलें
शह दिल को मिल गई है फिर उन की निगाह सेफिर शौक़ ढूँढता है दिल-ओ-जाँ नए नए
हो गए राम जो तुम ग़ैर से ए जान-ए-जहाँजल रही है दिल-ए-पुर-नूर की लंका देखो
दर्द-ए-दिल और जान-लेवा पुर्सिशेंएक बीमारी की सौ बीमारियाँ
ख़ुशा वो दौर कि जब मरकज़-ए-निगाह थे हमपड़ा जो वक़्त तो अब कोई रू-शनास नहीं
आप ही मरकज़-ए-निगाह रहेजाने को चार-सू निगाह गई
जो किरन थी किसी दरीचे कीमरक़ज-ए-बाम हो रही है अब
कूचा-ए-यार मरकज़-ए-अनवारअपने दामन में दश्त-ए-ग़म की ख़ाक
मौज़ू'-ए-गुफ़्तुगू तो है जिंसी जमालियातऔर मरकज़-ए-ख़याल तुम्हारा ही जिस्म है
कितने ही दाएरों में बटा मरकज़-ए-ख़यालइक बुत के हम ने सैकड़ों पैकर बना दिए
अब न काबा की तमन्ना न किसी बुत की हवसअब तो ज़िंदा हूँ किसी मरकज़-ए-इंसाँ के लिए
इक ये भी तो अंदाज़-ए-इलाज-ए-ग़म-ए-जाँ हैऐ चारागरो दर्द बढ़ा क्यूँ नहीं देते
अश्क-ए-ग़म उक़्दा-कुशा-ए-ख़लिश-ए-जाँ निकलाजिस को दुश्वार मैं समझा था वो आसाँ निकला
मानी-ए-जावेदान-ए-जाँ कुछ भी नहीं मगर ज़ियाँसारे कलीम हैं ज़ुबूँ सारा कलाम रंज है
उश्शाक़ जाँ-ब-कफ़ खड़े हैं तेरे आस-पासऐ दिल-रुबा-ए-ग़ारत-ए-जाँ अपने फ़न में आ
साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहींरिश्तों में ढूँढता है तो ढूँडा करे कोई
वही कैफ़िय्यत-ए-चश्म-ओ-दिल-ओ-जाँ है 'इक़बाल'न कोई रब्त बना और न रिश्ता टूटा
पूछ न वस्ल का हिसाब हाल है अब बहुत ख़राबरिश्ता-ए-जिस्म-ओ-जाँ के बीच जिस्म हराम हो गया
अज़ाब-ए-वहशत-ए-जाँ का सिला न माँगे कोईनए सफ़र के लिए रास्ता न माँगे कोई
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