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शेर
देखने वाले ये कहते हैं किताब-ए-दहर में
तू सरापा हुस्न का नक़्शा है मैं तस्वीर-ए-इश्क़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
शेर
हुस्न काफ़िर था अदा क़ातिल थी बातें सेहर थीं
और तो सब कुछ था लेकिन रस्म-ए-दिलदारी न थी
आल-ए-अहमद सुरूर
शेर
वुसअ'त-ए-मशरब-ए-रिंदाँ का नहीं है महरम
ज़ाहिद-ए-सादा हमें बे-सर-ओ-सामाँ समझा
पंडित जवाहर नाथ साक़ी
शेर
वुफ़ूर-ए-शौक़ में इक इक क़दम मेरा क़यामत था
ख़ुदा मालूम क्यूँ-कर जल्वा-ज़ार-ए-हुस्न तक पहुँचा
महशर लखनवी
शेर
ख़रीदारी-ए-जिंस-ए-हुस्न पर रग़बत दिलाता है
बना है शौक़-ए-दिल दल्लाल बाज़ार-ए-मोहब्बत का
असद अली ख़ान क़लक़
शेर
नहीं तिल धरने की जागह जो ब-अफ़्ज़ूनी-ए-हुस्न
देखा शब उस को तो इक ख़ाल ब-रुख़्सार न था