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शेर
तुंदी-ए-सैल-ए-वक़्त में ये भी है कोई ज़िंदगी
सुब्ह हुई तो जी उठे, रात हुई तो मर गए
हज़ीं लुधियानवी
शेर
ये माना सैल-ए-अश्क-ए-ग़म नहीं कुछ कम मगर 'अरशद'
ज़रा उतरा नहीं दरिया कि बंजर जाग उठता है
अरशद कमाल
शेर
मिरी ज़िंदगी की ज़ीनत हुई आफ़त-ओ-बला से
मैं वो ज़ुल्फ़-ए-ख़म-ब-ख़म हूँ जो सँवर गई हवा से
परवेज़ शाहिदी
शेर
'मुसहफ़ी' कर्ब-ओ-बला का सफ़र आसान नहीं
सैंकड़ों बसरा-ओ-बग़दाद में मर जाते हैं
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
सैल-ए-गिर्या का मैं ममनूँ हूँ कि जिस की दौलत
बह गई दिल से मिरे जूँ ख़स-ओ-ख़ाशाक हवस