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शेर
कभू जो शैख़ दिखाऊँ मैं अपने बुत के तईं
ब-रब्ब-ए-क'अबा तुझे हसरत-ए-हरम न रहे
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
शेर
तमीज़-दैर-ओ-का'बा है न फ़िक्र-ए-दीन-दुनिया है
ये रिंद-ए-पाक-तीनत भी तिरे अल्लाह वाले हैं
जलील मानिकपूरी
शेर
वाइ'ज़ों बुनियाद-ए-का'बा में बुतों की हस्तियाँ
हम मुसलमाँ हो चुके और तुम मुसलमाँ कर चुके
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
शेर
सिराज लखनवी
शेर
बुतों में किस बला की है कशिश अल्लाह ही जाने
चले थे शौक़-ए-काबा में सनम-ख़ाने में जा निकले
रंजूर अज़ीमाबादी
शेर
मुबारक दैर-ओ-का'बा हों 'क़लक़' शैख़-ओ-बरहमन को
बिछाएँगे मुसल्ला चल के हम मेहराब-ए-अबरू में
असद अली ख़ान क़लक़
शेर
दैर ओ काबा में भटकते फिर रहे हैं रात दिन
ढूँढने से भी तो बंदों को ख़ुदा मिलता नहीं