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शेर
ये थोड़ी थोड़ी मय न दे कलाई मोड़ मोड़ कर
भला हो तेरा साक़िया पिला दे ख़ुम निचोड़ कर
बहादुर सिंह काम बदायूनी
शेर
यक क़तरा ख़ूँ बग़ल में है दिल मिरी सो इस को
पलकों से तेरी ख़ातिर क्यूँकर निचोड़ डालूँ
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
जबीं पर सादगी नीची निगाहें बात में नरमी
मुख़ातिब कौन कर सकता है तुम को लफ़्ज़-ए-क़ातिल से
हसरत मोहानी
शेर
जिए जाते हैं पस्ती में तिरे सारे जहाँ वाले
कभी नीचे भी नज़रें डाल ऊँचे आसमाँ वाले
मुज़्तर ख़ैराबादी
शेर
किताब-ए-आरज़ू के गुम-शुदा कुछ बाब रक्खे हैं
तिरे तकिए के नीचे भी हमारे ख़्वाब रक्खे हैं