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शेर
आश्ना जब तक न था उस की निगाह-ए-लुत्फ़ से
वारदात-ए-क़ल्ब को हुस्न-ए-बयाँ समझा था मैं
हबीब अहमद सिद्दीक़ी
शेर
निगह-ए-लुत्फ़ में है उक़्दा-कुशाई मुज़्मर
काम बिगड़े हुए बंदों के सँवर जाते हैं
शेर सिंह नाज़ देहलवी
शेर
मुझ पर ब-तौर-ए-ख़ास थी उस की निगाह-ए-लुत्फ़
कहता मैं किस तरह मिरे दुश्मन में कुछ न था
फ़ाज़िल अंसारी
शेर
कल बज़्म में सब पर निगह-ए-लुतफ़-ओ-करम थी
इक मेरी तरफ़ तू ने सितमगार न देखा
शैख़ मोहम्मद रोशन जोशिश लखनवी
शेर
न कर ऐ 'लुत्फ' नाहक़ रहरवान-ए-दैर से हुज्जत
यही रस्ता तो खा कर फेर है का'बे को जा निकला
मिर्ज़ा अली लुत्फ़
शेर
दोनों हों कैसे एक जा 'मेहदी' सुरूर-ओ-सोज़-ए-दिल
बर्क़-ए-निगाह-ए-नाज़ ने गिर के बता दिया कि यूँ
एस ए मेहदी
शेर
इब्न-ए-इंशा
शेर
रुस्वा अगर न करना था आलम में यूँ मुझे
ऐसी निगाह-ए-नाज़ से देखा था क्यूँ मुझे