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शेर
तिरी रू-नुमाई की रात भी मैं जहाँ खड़ा था खड़ा रहा
कि हुजूम-ए-शहर को चीर कर मुझे रास्ता नहीं चाहिए
इदरीस आज़ाद
शेर
तेरे ख़ुश-पोश फ़क़ीरों से वो मिलते तो सही
जो ये कहते हैं वफ़ा पैरहन-ए-चाक में है
सय्यद आबिद अली आबिद
शेर
मुज़्तर ख़ैराबादी
शेर
भला वो ख़ातिर-ए-आज़ुर्दा की तस्कीन क्या जानें
जिन्हों ने ख़ुद-नुमाई ख़ुद-परस्ती ज़िंदगी भर की