aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "pade"
झुक कर सलाम करने में क्या हर्ज है मगरसर इतना मत झुकाओ कि दस्तार गिर पड़े
प्यासो रहो न दश्त में बारिश के मुंतज़िरमारो ज़मीं पे पाँव कि पानी निकल पड़े
मुद्दत के बा'द उस ने जो की लुत्फ़ की निगाहजी ख़ुश तो हो गया मगर आँसू निकल पड़े
जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्कयूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े
कब तक पड़े रहोगे हवाओं के हाथ मेंकब तक चलेगा खोखले शब्दों का कारोबार
ये जो मिलाते फिरते हो तुम हर किसी से हाथऐसा न हो कि धोना पड़े ज़िंदगी से हाथ
तुम्हारे ख़त में नज़र आई इतनी ख़ामोशीकि मुझ को रखने पड़े अपने कान काग़ज़ पर
हमें हर वक़्त ये एहसास दामन-गीर रहता हैपड़े हैं ढेर सारे काम और मोहलत ज़रा सी है
दरवाज़ा जो खोला तो नज़र आए खड़े वोहैरत है मुझे आज किधर भूल पड़े वो
इतना तो ज़िंदगी में किसी के ख़लल पड़ेहँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े
तिश्ना-लब ऐसा कि होंटों पे पड़े हैं छालेमुतमइन ऐसा हूँ दरिया को भी हैरानी है
अच्छा हुआ कि सब दर-ओ-दीवार गिर पड़ेअब रौशनी तो है मिरे घर में हवा तो है
वो भी शायद रो पड़े वीरान काग़ज़ देख करमैं ने उस को आख़िरी ख़त में लिखा कुछ भी नहीं
घर में रहा था कौन कि रुख़्सत करे हमेंचौखट को अलविदा'अ कहा और चल पड़े
होते ही शाम जलने लगा याद का अलावआँसू सुनाने दुख की कहानी निकल पड़े
डरता हूँ आसमान से बिजली न गिर पड़ेसय्याद की निगाह सू-ए-आशियाँ नहीं
दर्द हो दुख हो तो दवा कीजेफट पड़े आसमाँ तो क्या कीजे
महफ़िल में लोग चौंक पड़े मेरे नाम परतुम मुस्कुरा दिए मिरी क़ीमत यही तो है
हम को भरम ने बहर-ए-तवहहुम बना दियादरिया समझ के कूद पड़े हम सराब में
मिले मुझ को ग़म से फ़ुर्सत तो सुनाऊँ वो फ़सानाकि टपक पड़े नज़र से मय-ए-इशरत-ए-शबाना
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