aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "pal.de"
जो तूफ़ानों में पलते जा रहे हैंवही दुनिया बदलते जा रहे हैं
झुक कर सलाम करने में क्या हर्ज है मगरसर इतना मत झुकाओ कि दस्तार गिर पड़े
तू कहानी ही के पर्दे में भली लगती हैज़िंदगी तेरी हक़ीक़त नहीं देखी जाती
प्यासो रहो न दश्त में बारिश के मुंतज़िरमारो ज़मीं पे पाँव कि पानी निकल पड़े
मत सहल हमें जानो फिरता है फ़लक बरसोंतब ख़ाक के पर्दे से इंसान निकलते हैं
मुद्दत के बा'द उस ने जो की लुत्फ़ की निगाहजी ख़ुश तो हो गया मगर आँसू निकल पड़े
वक़्त की गर्दिशों का ग़म न करोहौसले मुश्किलों में पलते हैं
मेरे अलावा उसे ख़ुद से भी मोहब्बत हैऔर ऐसा करने से वो बेवफ़ा नहीं होती
जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्कयूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े
कब तक पड़े रहोगे हवाओं के हाथ मेंकब तक चलेगा खोखले शब्दों का कारोबार
ये जो मिलाते फिरते हो तुम हर किसी से हाथऐसा न हो कि धोना पड़े ज़िंदगी से हाथ
तुम्हारे ख़त में नज़र आई इतनी ख़ामोशीकि मुझ को रखने पड़े अपने कान काग़ज़ पर
हमें हर वक़्त ये एहसास दामन-गीर रहता हैपड़े हैं ढेर सारे काम और मोहलत ज़रा सी है
दरवाज़ा जो खोला तो नज़र आए खड़े वोहैरत है मुझे आज किधर भूल पड़े वो
इन्ही ग़म की घटाओं से ख़ुशी का चाँद निकलेगाअँधेरी रात के पर्दे में दिन की रौशनी भी है
ग़ौर से देखते रहने की सज़ा पाई हैतेरी तस्वीर इन आँखों में उतर आई है
इतना तो ज़िंदगी में किसी के ख़लल पड़ेहँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े
अश्क-ए-ग़म दीदा-ए-पुर-नम से सँभाले न गएये वो बच्चे हैं जो माँ बाप से पाले न गए
ऐसे छुपने से न छुपना ही था बेहतर तेरातू है पर्दे में मगर ज़िक्र है घर घर तेरा
उदास आँखों से आँसू नहीं निकलते हैंये मोतियों की तरह सीपियों में पलते हैं
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