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शेर
परिंदों में तो ये फ़िरक़ा-परस्ती भी नहीं देखी
कभी मंदिर पे जा बैठे कभी मस्जिद पे जा बैठे
नूर तक़ी नूर
शेर
ज़ाहिदो पूजा तुम्हारी ख़ूब होगी हश्र में
बुत बना देगी तुम्हें ये हक़-परस्ती एक दिन
मुनीर शिकोहाबादी
शेर
बुत-परस्ती जिस से होवे हक़-परस्ती ऐ 'ज़फ़र'
क्या कहूँ तुझ से कि वो तर्ज़-ए-परस्तिश और है
बहादुर शाह ज़फ़र
शेर
हम से खुल जाओ ब-वक़्त-ए-मय-परस्ती एक दिन
वर्ना हम छेड़ेंगे रख कर उज़्र-ए-मस्ती एक दिन
मिर्ज़ा ग़ालिब
शेर
वतन-परस्ती हमारा मज़हब हैं जिस्म-ओ-जाँ मुल्क की अमानत
करेंगे बरपा क़हर अदू पर रहेगा दाइम वतन सलामत
दीपक पुरोहित
शेर
ग़रीबी किस बला का नाम है उन की बला जाने
ख़ुदा है जिन की दौलत जिन का शेवा ज़र-परस्ती है
फ़ैज़ लुधियानवी
शेर
बुत-परस्ती में न होगा कोई मुझ सा बदनाम
झेंपता हूँ जो कहीं ज़िक्र-ए-ख़ुदा होता है
मिर्ज़ा हादी रुस्वा
शेर
उम्र तो अपनी हुई सब बुत-परस्ती में बसर
नाम को दुनिया में हैं अब साहब-ए-इस्लाम हम
असद अली ख़ान क़लक़
शेर
मैं 'हसरत' मुज्तहिद हूँ बुत-परस्ती की तरीक़त का
न पूछो मुझ को कैसा कुफ़्र है इस्लाम क्या होगा
हसरत अज़ीमाबादी
शेर
था जिन्हें हुस्न-परस्ती से हमेशा इंकार
वो भी अब तालिब-ए-दीदार हैं किन के उन के