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शेर
शाम मिम्बर पर फ़ज़ीलत के बहुत संजीदा फ़रहाँ
सुब्ह-दम अफ़्सुर्दगी के फ़र्श पर बिखरा हुआ मैं
सिराज अजमली
शेर
रुख़्सार पर है रंग-ए-हया का फ़रोग़ आज
बोसे का नाम मैं ने लिया वो निखर गए
हकीम मोहम्मद अजमल ख़ाँ शैदा
शेर
ग़ज़ल लिख कर तिरी दीवार पर लटका के जब आता
तो सारी रात फिर गिर्या दर-ओ-दीवार करता था
फ़र्रुख नवाज़ फ़र्रुख़
शेर
अच्छे-ख़ासे लोगों पर भी वक़्त इक ऐसा आ जाता है
और किसी पर हँसते हँसते ख़ुद पर रोना आ जाता है
अज़हर फ़राग़
शेर
जिसे तुम चाह कर भी पार हरगिज़ कर नहीं पाए
में टूटी-फूटी कश्ती से वो दरिया पार करता था